मदनी नगर में पुस्तकालय

मदनी नगर, बर्राई

सन 2017 में डीएनटी एकजुटता के संदर्भ में हम लोगों का अलग-अलग जगह जाना हुआ।जहाँ भी घुम्मकड़ समुदाय के लोग रहते थे, उनसे मिलने और एकजुटता प्रोग्राम की जानकारी साझा करने के उद्देश्य से झागरिया जाना हुआ। उसी रास्ते में जाते हुए इस बस्ती (मदनी नगर) पर नजर पड़ी।वहाँ रुककर हमने एक-दो लोगों से बात की, जो अपने आप को मुसलमान, बंजारा बता रहे थे। पूरी बस्ती में पन्नी से बनी झुग्गियॉं थीं, उसी समय से इस बस्ती पर मेरी नजर हमेशा रहती थी । इसके बाद बीच- बीच में वहाँ से निकलना होते रहता था, मदनी नगर में 98 परिवार रहते है, जिसमें 54 मुस्लिम परिवार है और 44 परिवार गौंड, मौची, और वाल्मिकी समुदाय के हैं। मार्च 2020 में कोविड-19 के समय लॉकडॉउन में इस बस्ती की याद आ गई | इस बस्ती की स्थिति को समझने के लिए जब पहुँचे, लोगों से बात करते हुए समझ आया कि लोगों की स्थिति बहुत खराब है। लोगों के घर राशन नहीं बचा था और सभी लोग इस बात से बहुत घबराए हुए थे| उस समय एक वक्त का पका हुआ खाने के लिए  गुरुद्वारे से कुछ पैकेट  मिल रहे थे , जो कि वहाँ की जनसंख्या के हिसाब से बहुत कम था | 

इस तरह वहाँ की परिस्थितियों को देखते हुए पूरे लाॅकडाउन के दौरान तीन बार राशन दिया| धीरे धीरे बस्ती के लोग हमें अच्छे से पहचानने लगें थे| जब लाॅकडाउन थोड़ा खुला, तो काम की मुश्किलों को समझने के लिए लोगों से बात करने जाते थे । कुछ लोगों को काम से जोड़ने की कोशिश की । उसी दौरान यहाँ के बच्चों से पढ़ाई और स्कूल के बारे में बातें हुई, तो समझ आया कि बच्चों की पढ़ाई की स्थिति भी अच्छी नहीं है | लाॅकडाउन में सारे बच्चे बस्ती के अन्दर ही रहते थे, तीन महीने से स्कूल बंद थे, जो बच्चे थोड़ा बहुत सीखे थे वो भी भूल रहे थे | बच्चों की इस स्थिति को देखते हुए चिंता हो रही थी | उनकी इस परिस्थिति को देखते हुए मदनी नगर में पुस्तकालय की शुरुआत हुई | 

 

 

 

 

 

 

चित्र (1) मदनी नगर बस्ती

पुस्तकालय का पहला दिन 

हम किताबों का थैला लेकर बच्चों के बीच पहुंचे, इस उद्देश्य के साथ कि लॉक डाउन के इस समय में बच्चे किताबों से जुड़े, उन्हें समझें ,पढ़ें और कुछ लिखे भी । लॉक डाउन के  कारण स्कूल बंद हैं, जिसके कारण पढ़ाई भी बंद है, इसलिए किताबें बच्चों तक पहुंचे, यह और भी जरूरी हो जाता है।

           बस्ती में किताबों का थैला देखकर बच्चे पूछने लगे कि ‘इसमें क्या है?’ जैसे ही झोले में से रंग-बिरंगी किताबें निकली, सारे बच्चे झपट कर किताब उठाने लगे ।थोड़ी देर शोर हुआ ‘यह वाली मुझे, यह किताब मुझे,’ फिर सभी के हाथों में किताबें थी । बच्चे किताबों को छू -छू कर देख रहे थे। सभी बच्चों ने किताबें उल्टी पकड़ रखी थी । ‘अरे देख, हाथी कित्तो बडो है… लड़की भी है, बकरी है, सांप भी है , सब कुछ है जा मैं तो!’ बच्चे कहने लगे।

            बच्चों की मां और बड़ी लड़कियाँ भी इन सब में शामिल हुए और कहने लगी कि ‘क्या इस तरह की भी किताबें होती है ? हम भी देख ले क्या?’ किताबों को छू -छू कर देखने लगी और कहने लगी, ‘स्कूल में तो ऐसी किताबें नहीं मिलती हैं । वह अपने छोटे बच्चों को किताबों के चित्रों को देखते हुए कहानी सुनाने लगीं, इस प्रक्रिया में वे खुद भी बहुत खुश हो रही थीं। थोड़ी देर के बाद सभी बच्चों को किताबों को सीधा पकड़ना दिखाया, बच्चे अपने मन से ही चित्र देखकर कहानी गढने लगे। ‘लड़की जा रही है, बारिश हो गई, हाथी आया ’ वगैरह -वगैरह । बच्चे जल्दी-जल्दी किताबों के पन्ने पलट कर दूसरी किताबों को देखना चाह रहे थे , ताकि ज्यादा से ज्यादा किताबें देख पाएँ।

            मदनीनगर के बच्चों को देखकर ऐसा सोचा था कि चूँकि स्कूल तो 500 मीटर की दूरी पर ही है, सभी बच्चे स्कूल जाते होंगे, पढ़ना भी आता ही होगा, लेकिन जब बच्चों को  उल्टी किताबें पकड़े हुए देखा तो बहुत आश्चर्य हुआ। बात करने पर पता चला कि मुस्लिम समुदाय के बच्चों का नाम स्कूल में दर्ज है ,पर वे स्कूल नहीं जाते और जो जाते भी हैं उनमें से ज्यादातर बच्चे पढ़ -लिख नहीं पाते ।

            बच्चे और माँऐं  कहने लगीं कि  ऐसी किताबें भी होती है क्या? किताबें दिखाने के बाद हमने उन्हें एक कहानी सुनाई, वह कहानी थी कामचोर डोकरा  (मुस्कान, 2012)। कामचोर डोकरा अगरिया समुदाय से लाई गई कहानी है जिसे मुस्कान ने प्रकाशित किया है। इस कहानी को सुनते वक्त सभी बच्चे चुपचाप मुंह खोले बैठे थे । करीब 40 -50 लोग जमा थे और सभी कहानी में मग्न थे, कहानी में जैसे ही डोकरा -डोकरी शब्द आते सभी बच्चे हँसने लग जाते, कहानी सुनकर लोगों की प्रतिक्रियाएँ कुछ इस तरह की दिखीं –

“सभी किताबों में ऐसी ही कहानियां है क्या?” “नई-नई और ज्यादा से ज्यादा कहानियां सुनना चाहते हैं हम”… “हमें तो पढ़ना नहीं आता तो हम कैसे पढ़ेंगे?”  गुड्डी जो कि अपनी बेटी रजीना के साथ वहां बैठी थी, ने कहा कि, “पढ़ना तो दूर इन्हे तो अपना नाम लिखना भी नहीं आता

 

 

 

 

 

 

 

चित्र (2) बच्चे और महिलाएं किताबें देखते हुए

चित्र बनाना  

पुस्तकालय के दौरान जब बच्चों को पहली बार चित्र बनाने को कहा तो शुरुआत में बच्चों ने कहा हमें नहीं आते चित्र बनाने । जब क्रेआन, पेंसिल और खाली कागज सामने रखे, तो छोटे बच्चे कलर को, कागज को छूने लगे और फिर धीरे-धीरे बड़े बच्चे  भी कलर और कागज को लेकर चित्र बनाने लगे । स्कूल जाने वाले बच्चों ने झंडे के कई चित्र बनाये, और जो स्कूल नहीं जाते, उन्होंने केवल कागज़ पर हर कलर के गोले बनाये। अगली बार चित्र बनाने से पहले हमने बच्चों को पूछा कि आज झंडे और घर के अलावा कुछ और चित्र बनाएँगे? ऐसे ही हर बार कुछ नये निर्देश दिए जाने की कोशिश रहती है, ताकि नए चित्र बनाने के लिए बच्चे कुछ सोच पाएँ; इस के लिए हमने कुछ चित्र वाली किताबें भी पुस्तकालय में रखने का निर्णय लिया, जैसे आम की कहानी, छोटी चींटी बड़ा काम आदि। इन किताबों की मदद से बच्चे चित्रों को देखकर खुद की कहानी गढ़ पाते हैं, जिससे उनमें पढ़ने के लिए आत्मविश्वास और बढ़ता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

चित्र (3) पुस्तकालय में बच्चों द्वारा बनाए गए चित्र

 

गीत कविताएंँ व कहानियां सुनाना 

बच्चों की झिझक दूर करने के लिए हम पुस्तकालय में हर दिन गीत-कविताओं से ही शुरू करने लगे। शुरुआत के दो-चार दिन तक बच्चे सावधान की स्थिति में खड़े होकर कविताएं दोहराते थे, मजेदारी के साथ नहीं।  जब उनसे पूछा कि ऐसा क्यों करते हैं तो उन्होंने बताया कि स्कूल में ऐसे ही कराया जाता है, डांस कर- कर के नहीं बोलना पड़ता । तब हमने कहा कि हम जैसे कर रहे हैं वैसे ही करने की कोशिश करें क्या? शायद ज़्यादा मज़ा आए । इसमें उनकी मांओंं ने भी बच्चों को प्रोत्साहित किया कि ‘जैसे मैडम बोल रही हैं वैसे करो’। इस तरह से उन बच्चों ने जल्दी ही कुछ कविताएँ याद कर ली जैसे-  शाबाश की गुड़िया, एक छोटी मछली और  इब्नबतूता आदि। खासकर छोटे बच्चे जो स्कूल नहीं जाते उन्हें इन कविताओं में बहुत मजा आया। जब भी हम पुस्तकालय के लिए जाते, बच्चे यह कविताएँ गुनगुनाते हुए मिलते हैं। 

पुस्तकालय में बच्चों की हर दिन बढ़ती संख्या और सीखने की उनकी ललक को देखते हुए यह बात समझ में आई  कि बच्चे पढ़ना सीखना तो चाहते हैं और उनके मम्मी -पापा भी उन्हें स्कूल भेजना चाहते हैं, लेकिन स्कूल में उन्हें वो माहौल और मजेदारी नहीं मिल पाती इसलिए वे स्कूल से जुड़ नहीं पाते। उदाहरण के लिए सबीर से जब पूछा कि स्कूल क्यों नहीं  जाते तो वह बोला कि वहाँ पर मुझे अच्छा नहीं लगता ,मेरा मन नहीं लगता क्योंकि बोर्ड पर से ही उतार कर लिखना पड़ता है।

इसी प्रकार गणेश है जो कि गोंड समुदाय का बच्चा है और कक्षा पांचवी में पढ़ता है। जब पुस्तकालय में आया तो उससे पूछा कि क्या कोई वाक्य लिख सकते हो, जो सामने बकरियां हैं उनको देखकर, उदाहरण के लिए बकरी काली है… तो वह बोला मैडम, मैं ऐसे नहीं लिख सकता अगर आप ब्लैक बोर्ड पर लिख दोगी तो मैं बहुत ही अच्छे से लिख कर बता दूँगा।

         हर बार सुनाने के लिए कौनसी कहानी हो, उसका चयन बस्ती को देखते हुए ही किया गया। शुरुआती दौर में मुस्कान द्वारा प्रकाशित कामचोर डोकरा, तुलिका द्वारा प्रकाशित चालबाज चिड़िया, और सी बी टी द्वारा प्रकाशित दादी की साड़ी आदि कहानियां समुदाय के बीच में सुनाई गई। सभी स्त्री-पुरुष, बच्चे और युवा कहानियों से जुड़ते हुए कहानियों के मजे लेते हैं।  एक दिन कामचोर डोकरा कहानी सुनाने के बाद बस्ती की महिलाओं से पूछा कि ‘क्या आप कोई कहानी सुनाना चाहती हैं ?’  तो उनका कहना था कि ‘हमें कैसे आएँगी कहानियां हम तो अनपढ़ हैं ‘ (कमला बाई), बाकी महिलाएं भी यही कह रही थी ।तब उन्हें बताया कि कामचोर डोकरा बापू नगर बस्ती में रहने वाली अगरिया समुदाय की एक महिला (सुमित्रा दीदी) ने सुनाई थी, जो कभी स्कूल नहीं गई। ‘आप भी अपने किस्से याद करिएगा और कभी पुस्तकालय में सुनाइएगा।’

 

 

 

 

 

 

चित्र (4) कविताएं करवाते हुए शिक्षक

किताबों वाली मैडम  

एक दिन जब मैं  कमल भैया के साथ बस्ती पहुंची तो मैंने मुकसद से कहा कि जाओ सभी बच्चों को पेड़ के नीचे बुला लो,  मुकसद तेजी से भागता हुआ जा रहा था और कहता जा रहा था ‘ओए किताब वाली मैडम आ गई है, ओए किताब वाली मैडम आ गई है,’ ऐसा चिल्लाते हुए बच्चों को बुला रहा था, मुझे बड़ा अचरज हुआ। वहीं गोंड समुदाय में जब पता चला तो वहां के कुछ बच्चे ‘ड्राइंग वाली’ तो कुछ पेड़ वाली मैडम कहते हुए चिल्लाकर आ रहे थे। दोनों ही जगहों के बच्चे किताबों का इंतजार करते दिखते हैं, और शुरुआत से अब तक बच्चों की संख्या बढ़ती ही दिख रही है। कभी-कभी 50- 60 बच्चे, महिलाएं और पुरुष भी कहानी सुनने के लिए जमा हो जाते हैं और गतिविधियों में भी भाग लेते हैं ।बच्चों के चित्रों में भी नई -नई चीजें दिखने लगी हैं।

 हम सब खुश रहते हैं 

इस बस्ती में जब आप जाएंगे, तो आप सोचेंगे कि शौचालय नहीं है, पानी की भी कोई व्यवस्था नहीं है, एक दिन छोड़कर टैंकर आता है । जितना पानी मिल गया ठीक है, नहीं तो हैंडपंप से बहुत दूर से पानी लाना पड़ेगा, किसी के घर टीवी या पंखे नहीं है, आस- पास कोई स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध नहीं है। इसके बाद भी यहां के बच्चे कहते हैं कि हम सब खुश रहते हैं ।

सनीना (16-17 वर्ष) पांचवी तक स्कूल में पढ़ी है। किताबें पढ़ पाती हैं, कुछ गल्तियों के साथ अपनी बात लिख भी पाती है ।उसने अपनी बस्ती के बारे में लिखा ‘ हम सब खुश रहते हैं। हमें कोई परेशानी नहीं है ‘  सनीना ने कहा “जब से किताबें लेकर आने लगे हैं , मैं रोज ही पढ़ाई करती हूं और कुछ ना कुछ लिखती हूं। मुझे बहुत अच्छा लगता है, मेरी वापस पढ़ाई शुरू हो गई है । ऐसा लग रहा है कि मैं फिर से स्कूल जाने लगी हूँ।”  वह कुछ किताबें रोज पढ़ने के लिए भी रख लेती हैं और बच्चों को किताबें देने व वर्कशीट देने में मदद भी करती हैं । सनीना कहती है कि ‘ जब मैं स्कूल जाती थी , तो मेरे साथ कोई नहीं आता था इसलिए मेरा भी स्कूल छूट गया ।अब मेरा मन करता है कि मैं भी पढ़ूं।’

बच्चों के सीखने की ललक से जुड़े कुछ उदाहरण :-

  • रजीना को जब वर्कशीट दी और कापी मे काम दिया तो उसके मम्मी -पापा ने बताया कि वो दिन रात लिखती रही, जब वो अपना नाम लिखना सीख गई तो बहुत खुश हुई । अब वो अपने भाई बहनों का नाम लिखना सीख रही है। 
  • ललिता कक्षा 8वी मे गई है। एक दिन जब वो पानी भरने जा रही थी तो उसने हमे पढ़ाते हुए देखा। वो अपनी कुप्पी को वही छोड़कर पास आई। कुछ देर उसने सब समझने की कोशिश की फिर बोली “मैम, क्या हमें भी कागज मिल सकता है ?” सारे बच्चों के जाने के बाद तक भी वो अपनी वर्कशीट करती रही और अब नियमित है और बाकी बच्चों को भी लेकर आती है। 

मदनी नगर बस्ती मे पुस्तकालय चलाते हुए अब तक दो माह हो गए हैं और बच्चों और बड़ों से एक जुड़ाव भी महसूस होने लगा है । इस स्थिति को समझते हुए ऐसा लग रहा है कि बच्चों का किताबों की ओर रुझान और सीखने की ललक बढ़ रही है। यहाँ पर जो बच्चे ड्रॉपआउट थे, वे पुस्तकालय के माध्यम से पढ़ाई से जुड़ रहे हैं और कई बच्चे बोलते भी हैं कि अब वो अपनी पढाई जारी रखना चाहते हैं ।

हम सोचते हैं कि स्कूल के पुस्तकालय को भी यदि इस तरह से संचालित किया जाए कि बच्चे किताबों को छू पाएं ,उनसे जुड़ पाएं  और चित्रों को देखकर कल्पना कर पाएं तो  उम्मीद है कि बच्चों का स्कूल के प्रति रुझान बढ़ेगा। 

यह लेख मुस्कान के दो शिक्षकों द्वारा मदनी नगर में बच्चों के साथ बातचीत और पुस्तकालय चलाने के अनुभवों को याद करते हुए लिखा है।  पृष्ठभूमि- कमल किशोर मालवीय; पुस्तकालय के अनुभव- शशि कला नारनवरे 

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