राहत सामग्री पहुँचाते हुए कुछ अनुभव

ज़रूरतमंदों को राहत सामग्री पहुँचाने के दौरान बहुत से ऐसे अनुभव हो रहे है जो दुखी कर देने वाले हैं और सोचने का अलग नज़रिया देते हैं| लोग इस मुश्किल दौर में कैसे अपना जीवन जी रहे हैं, उनसे मिलकर, बात करके वास्तविक स्थिति का पता चलता है|

भूख और बीमारी का डर 

हिनोत्री आदिवासी अपनी गोद में अपने 4 महीने के बच्चे को लेकर माँगने जा रही है, तेज़ धूप के कारण बच्चा माँ से चिपका हुआ है। माँ ने धूप से बचाने के लिए बच्चे को एक कपडा से ढँक रखा है| पुछा तो बोली, “घर में खाने के लिए कुछ नहीं है, बच्चे भूखे हैं|” वो कहती है कि उसे पता है कि सरकार ने लॉक डाउन लगा रखा है और कोरोना जैसी बीमारी से बचने के लिए घर में ही रहना ज़रूरी है, घर में रह कर ही बीमारी से बचा जा सकता है, “खुद को लॉक डाउन कर लें लेकिन भूख को कैसे लॉक डाउन करें? बच्चों को भूख से बिलखता हुआ नहीं देखा जाता|” पेट की आग बुझाने के लिए उसे मांगने जाना ही है, “पानी पीकर कितना समय भूख को रोकें? हम लोग कोरोना से तो बाद में मरेंगे, पहले भूख से ही मर जाएँगे”| 

बच्चे भूखे हैं इसलिए खुद की और अपने नवजात बच्चे की जान को जोखिम में डालकर घर से बाहर निकली है| आखिरकार ये सारी जद्दोजहद जिन्दा रहने की ही तो है, अगर सचमुच में स्थिति खराब नहीं होती तो कौन जानबूझकर अपनी और अपने कलेजे के टुकड़े की जान को खतरे में डालेगा? बस्ती की उसके जैसी कई महिलाएं सुबह से माँगने के लिए निकल जाती हैं ताकि एक वक़्त का खाना पक सके|

हिनोत्री ने बताया आसपास और बस्ती के सभी लोग फाकाकसी को मजबूर हैं और सड़क पर भी कोई नहीं है जिनसे वो कुछ मांग सके| मांगने के लिए वह गाँधी नगर से करोंद चौराहे तो कभी बैरागढ़ तक जाती है, यह दूरी 8 से 12 किलो मीटर तक होती है| उसे यह भी नहीं पता कि मांगने पर कुछ मिलेगा भी या नहीं, लेकिन फिर भी घर से निकल जाती है, इसी उम्मीद में कि शायद कुछ मिल जाए और बच्चों के खाने का कुछ इन्तज़ाम हो पाए| माँगने जाने पर पुलिस का भी डर रहता है, शुरू में तो वे रोकते थे, घर भगाते थे, कभी कभी चिल्लाते थे कि पूरी दुनिया घरों में बंद है और ये माँगने निकले हैं, लेकिन अब जाने देते है| “घर से निकलकर मांगेंगे नहीं तो बच्चों का पेट कैसे भरेगा?” 

माँगने पर कभी पैसे मिल जाते है तो कभी पका हुआ खाना| हिनोत्री पैसों से कुछ तेल मसाले खरीद लेती है और शाम को कुछ खाना पका लेती है| वो कह रही थी कि, “राशन कार्ड नहीं है, कण्ट्रोल वाले ने 5 किलो चावल दिया है, इतने में कैसे गुजर होगी| बिना राशनकार्ड वाले सभी लोगों की यही कहानी है|” सरकार ने प्रति परिवार 5 किलो चावल दे कर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड लिया| जिन राशन कार्ड धारकों को राशन मिला भी उनके पास तेल, नमक, मिर्च मसाले खरीदने के भी पैसे नहीं है| बिना तेल मसाले के कैसे खाना पकाएं? चावल अकेले कब तक उबाल कर खाएं? 

29 मार्च को सरकार ने आदेश जारी किया है कि बिना राशन वालों को प्रति व्यक्ति 5 किलो के हिसाब से चावल या आटा दिया जाएगा लेकिन ये आदेश सिर्फ कागज़ों में ही पढने को मिल रहे है, यथार्थ में लोगों को सरकारी घोषणा के अनुसार राशन का वितरण नहीं किया जा रहा है| तेल, मसाले की तो दूर की बात, जब लोग पूछते कि दाल देने के भी तो आदेश हुए है तो सरकारी दुकान के वितरक बोलते है कि- हमारे ही पास नहीं है तो तुम लोगों को कहाँ से दे दें, जब हमारे पास आएगी तो दे देंगे| अब सोचिए सिर्फ चावल और गेहूं को लोग कैसे पकाएं और खाएं? क्या हमारे देश के नीति निर्धारकों, अफसरशाही को यह नहीं पता कि खाना पकाने के लिए क्या क्या सामान की ज़रूरत होती है? क्या अफसर, नेता, मंत्री एक दिन भी इस तरह का खाना खा सकते है? 

लोग कह रहे कि “हमने नेता की बात मानकर घंटी बजाई, थाली पीटी, दूसरों से माँगकर अपनी झुग्गी में दिया भी जलाया लेकिन क्या यह सब करने से हमारे घरों में खाना पक जाएगा, हमारे बच्चे को पेट भर खाना मिल जाएगा? आज लॉक डाउन के 40 दिन गुजर गए हमारे बच्चे भर पेट खाना नहीं खा पा रहे हैं  क्यूँकि सरकार हम गरीबों को दो वक़्त का खाना खिला पाने में असफल रही है|” 

इस पूरे लॉक डाउन के दौरान गरीबों, मेहनतकश दिहाड़ी मजदूरों के बच्चों में निश्चित तौर पर कुपोषण का प्रतिशत बढेगा|

कर्बला घाट

कर्बला घाट बड़ा तालाब पर बहुत से लोग बैठे होते हैं, इस आस में कि कोई कुछ दे जाएगा और एक वक़्त के खाने का इन्तज़ाम हो जाएगा| हर गुज़रती गाड़ी को बड़ी आस भरी नज़रों से देखते है लेकिन इन स्थानों पर लोग ही नहीं जा रहे तो इन माँगने वालों को भी कुछ नहीं मिल रहा| भूख एक बड़ी समस्या के रूप में मुह बाए खड़ी है| लोग भूख से मरने लगे हैं, भोपाल के नादरा बस स्टैंड पर भूख से मरे बुजुर्ग की हालत देखकर यही लगता है कि उनको कई दिनों से उन्हें खाने को कुछ नहीं मिला होगा| बहरहाल, कर्बला पर बैठे लोगों को जब हमने दाल लेने को कहा तो कईयों ने मना कर दिया बोले, “हमारा तो घर ही नहीं है, दाल लेकर क्या करेंगे, कैसे पकाएंगे, कुछ पका हुआ हो तो दे दो|” कई लोगों को दाल ही दी, किसी ने अपने टी-शर्ट को ऊपर उठाकर उसमे लिया, कोई पास से पन्नी उठा लाया, किसी ने दाल अपनी झोले में रख ली| इन्हीं लोगों की लाइन में एक बुजुर्ग, जिनकी उम्र लगभग 75 साल होगी, बैठे हुए थे, उनके हाथ और गर्दन कांप रहे थे, उन्हें जब तीन अंजुली भर के दाल दी तो बोले बस इतना काफी है और चौथी अंजुली दाल लेने से मना कर दिया| उनके चेहरे पर बेचैनी थी किन्तु इतनी अनिश्चितता की स्थिति में भी आँखों में संतोष का भाव दिख रहा था| 

थोडा आश्चर्य हुआ, जहाँ लोग अगली कई पीढ़ियों तक के लिए संसाधन और संपत्ति का संग्रह कर रहे और फिर भी असंतोष से भरे हुए है, उनकी लूट की भूख ख़तम नहीं होती, वहाँ उन ज़रूरतमंद ने जिनके पास खाने के लिए कुछ नहीं था, उन्होंने आज की ज़रूरत पूरी होने पर और दाल लेने से मना कर दिया| अक्सर लोगों को कहते हुए सुना है कि गरीबों को कितना भी दे दो इनका पेट नहीं भरता, लेकिन इस अनुभव ने बताया कि वैसा नहीं है जैसा लोग कहते हैं, वे कल की चिंता नहीं करते और आज को जीने पर ही विश्वास करते हैं | 

राशन की मशक्कत

सुबह 6 बजे से ही सरकारी राशन की दुकान पर राशन लेने के लिए लोगों का पहुँचना शुरू हो जाता है, हांलाकि राशन बाँटना 11 बजे से शुरू होगा लेकिन लोग सुबह से ही आकर लाइन लगाने लगे हैं| दो लाइन, एक के बाजू में एक, लगती जा रही थी, लोग एक दूसरे के बीच 1 मीटर का फ़ासला रखते हुए लाइन में खड़े हो रहे है, धीरे धीरे लाइन लम्बी होती जाती है और दुकान से लगभग 70-80 मीटर की दूरी तक लाइन लग जाती है| लाइन में खड़े खड़े लोग थकने लगते तो अपनी थैली बिछाकर बैठ जाते, फिर थोड़ी देर बाद खड़े हो जाते; यही क्रम चलता रहता| धीरे धीरे सूरज की धूप की तीक्ष्णता बढती जाती तो लोग धूप से बचने के लिए बोरी सर पर रख लेते| बोरी कभी बैठने के काम आती तो कभी सर ढकने के काम आती| धूप में खड़े-खड़े गला सूखने पर लाइन में लगे लोग जाकर कभी पानी पी आते तो कभी धूप के चटकों से राहत के लिए पैरों को पानी से भिगा लेते और आकर फिर से लाइन में लग जाते| सूरज भी लोगों का इम्तिहान ले रहा था| धूप की तीव्रता बढ़ती जा रही थी| धूप के असहनीय होने पर इंसानों की लाइन की जगह बोरियाँ उनके प्रतिनिधित्व में सड़क पर रख दी गई| लोगों की लाइन की जगह धीरे- धीरे बोरियों की लाइन लगने लगी और बोरियों के मालिक आसपास के घरों की आड़ में जाकर छाँव में खड़े होने लगे| जैसे हॉस्पिटल में बूढ़े बाप की जगह उसका बेटा पर्चे की लाइन में खड़ा होकर बुजुर्ग को परेशानी से बचाता है, वैसे ही भूमिका ये बोरियाँ और थेलियाँ निभा रही थीं| चिलचिलाती धूप में सुनसान सड़क पर रखी बोरियाँ भी सोशल डिस्टेंसिंग के रूल को फॉलो कर रही थी| लोग झुण्ड बनाकर आसपास छाँव में खड़े थे और बोरियाँ लाइन में लगी हुई थी, जो लोगों को सूरज की प्रचंड धूम से बचा रही थी| बीच-बीच में पुलिस वाला आकर उन्हें झुण्ड से अलग होने की और लाइन में खड़े रहने की हिदायत देते, लोग थोड़ी देर धूप में खड़े होते फिर अपने प्रतिनिधि को अपनी जगह छोड़कर वापस छाँव में आकर खड़े हो जाते| राशन कब मिलेगा यह तो पता नहीं पर लोग 4-5 घंटे लाइन में लगकर दुकान के खुलने और राशन के मिलने का इंतज़ार करते है| अमूमन यही दृश्य हर कण्ट्रोल की दुकान पर होता है|

यह लेख ब्रजेश वर्मा ने राहत कार्य करते वक़्त हुयी मुलाक़ातों से लिखा है। ईमेल: brijeshverma3@gmail.com

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