लॉक डाउन का गरीब बच्चों की शिक्षा पर असर

लॉक डाउन का गरीब बच्चों की शिक्षा पर असर

लॉक डाउन ने हर किसी को अपनी तरह से असर किया है| इस दौरान लोगों के रोजगार छिनने और पूरे देश  की अर्थव्यवस्था के बेपटरी होने की बहुत चर्चा हो रही है| बड़े बड़े राहत पैकेज की घोषणा सरकारों के द्वारा की जा रही है| जिसमे सारा फोकस इस बात पर है कि बेपटरी हुई अर्थव्यवस्था को कैसे पटरी पर लेकर आएं लेकिन इस पूरे बहस में बच्चों की शिक्षा की कहीं कोई चर्चा नहीं हैं| न किसी सरकार द्वारा और न ही किसी राजनैतिक दल द्वारा इस पर कोई संज्ञान लिया जा रहा है|

सरकार द्वारा लॉक डाउन के साथ ही सभी शिक्षण संस्थानों को भी बंद करने के आदेश दिए गए हैं | बच्चों की सुरक्षा की दृष्टि से यह निर्णय सही हैं किन्तु बच्चों की शिक्षा कैसे पटरी पर आए इसकी कोई कोशिश सरकार द्वारा नहीं की जा रही| प्रदेश के सभी सरकारी स्कूल बंद है जिससे बच्चों की पढ़ाई असर में आई है| असर जैसी रिपोर्ट बताती हैं कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा की स्थिति वैसे ही बहुत खराब है, बच्चे अपनी कक्षा के अनुसार दक्षता नहीं रखते है| इस पर किसी की चिंता नहीं दिखाई दे रही है|

हम देख रहे है कि लॉक डाउन के दौरान बहुत से प्राइवेट स्कूल ऑन लाइन के माध्यम से बच्चों की शिक्षा को चालू रखने का प्रयास कर रहें हैं| यह अलग बात है कि इस प्रकार के प्रयास से बच्चे कितना सीख पा रहे होंगे किन्तु इस सब से वे बच्चों के पालकों पर फीस का दबाव बना पाएँगे और अपनी शिक्षा की दुकान को आर्थिक रूप से सुद्रण कर पाएँगे| शिक्षा का यह रूप कितना कारगर होगा इस पर एक प्रश्नचिन्ह तो है ही| इस प्रयास में भी सस्ते प्राइवेट स्कूल यह सुविधा बच्चों को नहीं दे पा रहे है क्योंकि इन बच्चों के घरों में एंड्राइड फ़ोन की अनुपलब्ध और उसके लिए नेट बैलेंस के लिए पैसे न होना बच्चों की पढ़ाई में एक बड़ी रुकावट है| लॉक डाउन में चल रही ऑनलाइन कक्षाओं के कारण वंचित समुदाय के बच्चे खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रहे है, वे सुविधा संपन्न बच्चों से पीछे रह जाएंगे इस प्रकार के विचार उनमे आ रहे है, बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है, वे अवसाद में भी जा रहे हैं| केरल की मजदूर परिवार की बच्ची एंड्राइड फ़ोन नहीं होने की वजह से अपनी ऑनलाइन क्लास में शामिल नहीं हो पा रही थी जिस कारण से उसका आत्महत्या जैसा कदम उठा लेना वंचित समुदाय के बच्चे की मानसिक स्थिति से हमें अवगत कराता है|  

अगर हम सरकारी स्कूलों की बात करें तो वहां शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चे मेहनतकश मजदूर वर्ग के बच्चे ही हैं जो दलित, आदिवासी, मुस्लिम और विमुक्त व घुमक्कड़ (पारधी, नट, दफाले, कुचबंदिया, कंजर, कलंदर, कालबेलिया) समुदायों से ताल्लुक रखते है, ये समुदाय देश की कुल आबादी का लगभग 80 प्रतिशत है| इन हाशिएकृत समुदायों के पहली कक्षा में दाखिला लेने वाले कुल बच्चों में से 5% बच्चे ही हायर सेकेंडरी की शिक्षा पूरी कर पाते है| बाकी बच्चे इसके पहले ही विभिन्न स्तरों पर स्कूलों से बाहर धकिया दिए जाते है| हमारे अनुभव है कि यदि इन समुदायों के बच्चे कई बार एक सप्ताह भी शिक्षा से छूटते हैं तो उन्हें वापिस जुड़ना बहुत कठिन होता है,  जबकि इस लॉक डाउन ने तो इन बच्चों और शिक्षा के बीच एक लम्बा फ़ासला पैदा कर दिया है| इन बच्चों को पुनः शिक्षा से जोड़ने में निश्चित तौर पर बहुत कठिनाइयाँ आएँगी|

हम लॉक डाउन के दौरान और उसके बाद भी लगातार कच्ची बस्तियों में जा रहे है जहाँ रहने वाले और स्कूल जाने वाले लगभग 80% बच्चे सरकारी स्कूलों में जा रहे है शेष 20% सस्ते प्राइवेट स्कूलों में जा रहे हैं|  यहाँ बच्चे पूरी तरह शिक्षा से छूट रहे हैं| लॉक डाउन ने इन समुदायों को आर्थिक दृष्टि से तोड़ कर रख दिया है, दिहाड़ी मजदूरों की मज़दूरी नहीं मिल रही, कबाड़ बीनने वालों को भी सड़कों पर कबाड़ नहीं मिल रहा, जो कबाड़ा मिल रहा उसे कबाड़ी आधी कीमत पर खरीद रहे हैं, लोकल ट्रांसपोर्ट नहीं चल रहे जिससे लोग काम के लिए दूर वाली जगहों पर जा नहीं पा रहे| इस स्थिति ने लोगों की कमाई ख़तम कर दी है, परिवार फाकाकशी को मजबूर है| 

कमाई करने निकलना 

पैसों की कमी और बड़ों के पास काम नहीं होने से बच्चों पर कमाई का दबाव पड़ा है| बच्चे काम पर जाने के लिए मजबूर हुए हैं| जो बच्चे लॉक डाउन के पहले स्कूल जा रहे थे वे अब काम पर जा रहे है| माँ बाप बच्चों की पढ़ाई को लेकर बहुत चिंतित है कि कब तक कोरोना चलेगा, हमारे बच्चों की पढ़ाई छूट रही है वे दिन भर खाली घूमते रहते है|

भोपाल शहर की जिन 50 बस्तियों तक हम पहुँच रहे हैं उनमे दलित, आदिवासी, मुस्लिम, विमुक्त व घुमक्कड़ समुदाय ही हैं वहाँ स्कूल जाने वाले अधिकांश बच्चे काम करने के लिए जा रहे है| बहुत सुबह-सुबह ही बच्चे काम के लिए निकल जाते हैं| छोटे छोटे बच्चे हाथ में फावड़ा, कुल्हाड़ी, हसिया टाँगे काम के लिए निकल रहे हैं| बच्चे कॉलोनी में जाकर घरों के बाहर काम के लिए आवाज़ लगाते है| लोग उन्हें अपना आँगन या गार्डन की घास काटने, पेडों की छटाई, पत्तियां साफ़ कराने के लिए उन्हें बुला लेते है, कोई अपनी घर की छतों की सफाई करवा लेते हैं, कोई पानी की टंकियों की सफाई करवा लेते हैं| इस काम से 30-40 रूपए कमाई हो जाती है, कभी कभी कोई कमाई भी नहीं होती| 

जो बच्चे लॉक डाउन के पहले नियमित स्कूल जाते थे वे अपनी माँ या बस्ती के लोगों के साथ कबाड़ बीनने जा रहे हैं, कोई-कोई अपने पापा, चाचा, भाई के साथ सब्जी बेचने के लिए जा रहे हैं| माता पिता भी सोचते हैं कि बच्चों के पास दिन भर कोई काम नहीं होता, यहाँ-वहां बैठने, बतियाने से अच्छा है सब्जी ही बेचने चले जाएं| इससे खालीपन भी नहीं होगा और परिवार की आमदनी भी हो जाएगी| 

6-7 साल तक के बच्चे भी कॉलोनियों में घरों और चौराहों पर माँगने जा रहे हैं| कोई अपनी माँ के साथ तो कोई अकेले ही माँगने जा रहे हैं| माँगने के लिए बच्चे 6-7 किलोमीटर दूर तक जा रहे हैं| माँगने पर 50 रूपए जब तक न हो जाएं बच्चे घर नहीं लौटते| इस प्रकार 4-6 घंटे तक बच्चे मांगते रहते है और घरों से बाहर होते हैं| 

बंजारा समुदाय में जहाँ शराब बनाना उनका पुश्तैनी धंधा है वहां जो बच्चे स्कूल जा रहे थे वे बच्चे शराब बेचने का काम कर रहे है| जीवन जीने के संकट जैसी मुश्किल और अन्य कोई विकल्प नहीं होने के चलते मजबूरीवश माता-पिता बच्चों को काम पर भेज रहे है या कई जगह पर यह समझ सकते हैं कि जाने से रोक नहीं रहे|

बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर 

अपने इस छोटे अनुभव की आधार पर हम कह सकते हैं कि लॉक डाउन में जिन बच्चों की पढ़ाई छूटी है उन बच्चों के मानसिक स्वस्थ्य पर भी असर हुआ है , बच्चे चिडचिडे और गुस्सैल हो रहे हैं| उनका आत्मविश्वास भी टूटा है| हमने जब बच्चों को अपने लॉक डाउन के अनुभव लिखने को कहा तो बच्चों के हाथ कांप रहे थे, बार बार पेज फाड़ रहे थे| 

पढ़ने पर असर 

जो बच्चे ठीक से पढ़ लेते थे वे अटक अटक कर पढ़ रहे| बच्चों का खुद पर भरोसा कम हुआ है| एक बच्ची ने अपनी टीचर को चिट्ठी लिखते हुए लिखा कि सॉरी, आपने मुझे बहुत अच्छे से पढ़ना सिखाया किन्तु अब मैं भूल गयी हूँ मुझे माफ़ कर दीजिये, इस प्रकार बच्चे आत्मग्लानी में जा रहे हैं|

लॉक डाउन में लड़कियों और विशेष ज़रूरत के बच्चे ज्यादा असर में आए है|  बाल विवाह बढ़ रहे हैं, शादी में जिन समुदायों में लड़के के परिवार वालों द्वारा लड़की के परिवार को पैसे देने का रिवाज़ है वहां आर्थिक तंगी के कारण माता पिता बच्चियों की शादी करवा रहे हैं ताकि इस स्थिति में कुछ राहत मिल सकें| जिन बच्चियों की पढाई अच्छी चल रही थी उन पर भी शादी का बहुत दबाव बढ़ रहा है| क्योंकि कब स्कूल खुलेंगे या आगे शिक्षा का क्या स्वरुप होगा, कैसे वे अपनी पढाई कर पाएंगी इसको लेकर जो धुंधलापन और अदूरदर्शिता सरकार द्वारा दर्शाई जा रही है उससे लड़कियों को भी कोई दूसरा रास्ता नहीं दिख रहा जिस कारण भी स्थिति से समझोता करके वे शादी के लिए हाँ कह रही है|

सरकार हर मोर्चे पर फेल साबित हुई है, न तो लोगों को रोज़गार दिला पाई और न ही ज़रुरात्मदों तक राशन ही पहुंचा पाई और ना ही बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था कर पाई| सरकार द्वारा जितनी झटपटाहट शराब की दुकान खोलने में दिखाई दे रही थी उतनी चिंता बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था को पुख्ता करने में क्यों नहीं दिखाई देती है| इससे सरकारों की बच्चों की शिक्षा को लेकर मंशा स्पष्ट दिखाई देती है, गरीब बच्चों की शिक्षा सरकार की प्राथमिकता में है ही नहीं | बच्चों की सुरक्षा का हवाला देकर शिक्षा की पूरी तरह से उपेक्षा करना बिलकुल सही नहीं है| यदि सरकार पहले जैसे स्कूल संचालित नहीं कर सकती तो कोई वैकल्पिक माध्यम उपलब्ध करने की दिशा में सोचना चाहिए अन्यथा जो बच्चे और समुदाय पहले से ही हाशिये पर है वे इस दौर में उन पर बिलकुल ही शिक्षा से बाहर होने का खतरा मंडरा रहा है|  दुनिया के बहुत से देशों बच्चों की शिक्षा की चिंता करते हुए और स्कूली पढ़ाई को फिर से शुरू करने के लिए प्रयास कर रहे है|  एक दिन के अंतर से बच्चों को स्कूल बुलाने और स्कूल में बच्चों को सुरक्षा के पर्याप्त साधन उपलब्ध करके स्कूलों का संचालन शुरू किया है, किन्तु हमारे देश में इस मुद्दे पर कहीं कोई बात नहीं हो रही| सरकारी द्वारा कोई भी प्रयास नहीं किये जा रहे | जिससे इन हाशिएकृत समुदायों मे एक निराशा का भाव आ रहा है|

केस स्टडी- अर्जुन* की उम्र 14 साल है वह सूरज नगर बस्ती में रहता है उसके परिवार में कुल 7 सदस्य हैं| वह 6 वी कक्षा में पढ़ाई कर रहा था| वह पढ़ाई में बहुत तेज़ है| अर्जुन बहुत ही संभावनाशील बच्चा है, खेल में उसकी रूचि है और उसको अपने फोटो और विडियो बनाने का भी शोक हैं| अर्जुन के पापा किराये का ऑटो रिक्शा चलाते हैं और बड़े भाई लोग दिहाड़ी मज़दूर हैं जो पत्थर खदानों में पत्थर तोड़ने का काम करते है| यही परिवार की आमदनी का मुख्य स्रोत है, लेकिन लॉक डाउन होने से परिवार की आमदनी का जरिया पूर्णतः बंद हो गया और परिवार के सामने खाने का संकट पैदा हो गया| वह बंजारा समुदायए का बच्चा है जो कि एक डीनोटीफाईड ट्राइब है| चूंकि बंजारा समुदायए ऐतिहासिक रूप से अति पिछड़ा और शोषित समुदायए रहा है जिनके लोग खानाबदोश जीवन जीते रहे हैं| इन समुदाय के लोगों के पास न तो खेती की ज़मीन है और न ही उनके पास अपनी रोजी रोटी का कोई अन्य स्थाई साधन रहा है| इन समुदायए में लोगों को कच्ची शराब बनाने के हुनर बहुत अच्छे तरह से आता है| वे त्योहारों या शादियों के समय अपने खुद के पीने के लिए महुए से शराब बनाते है|

शराब बनाकर बेचना बंजारा समुदायए का पुश्तैनी काम है किन्तु युवाओं के प्रयास से पिछले कई वर्षों से लोगों ने यह काम करना काफी हद तक बंद कर दिया था| किन्तु आज के इस लॉक डाउन के विषम दौर में जब की उनके सामने जीवन जीने का संकट पैदा हो गया है समुदाए के अन्य लोगों की तरह अर्जुन भी शराब बेचने का काम कर रहा है| अर्जुन को कभी किसी ने बोला नहीं की तुझे ये काम करना हैं या इससे तेरा घर चल सकता हैं न ही अर्जुन के दिमाग में ये बात किसी ने लाकर डाली हैं| वो अर्जुन को खुद दिखने लगा और इस lockdown में समझने लगा कि उसे भी कुछ यही काम करना चाहिए जिससे घर का खर्च चल सके| वह कहता है कि भैया मुझे पता है कि यह काम मुझे नहीं करना चाहिए लेकिन मेरे सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं हैं| यदि मैं शराब बेचने नहीं जाऊंगा तो मेरा परिवार भूखा मरने की नोबत आ जाएगी| तीन दिन पहले मेरी माँ की तबीयत खराब हुई तो मेरे घर में एक रूपए नहीं था कि मैं मेडिकल से उनके लिए दवाइयां खरीद लाता| पापा कभी मुझे शराब बेचने के लिए हाँ नहीं कहते लेकिन उन्होंने मजबूरी में मुझे शराब बेचेने की मूक सहमती दी है| बड़े लोगों का पुलिस के द्वारा पकडे जाने की संभावना ज्यादा होती है और उनको मार भी बहुत पड़ती है इसलिए मैं ही शराब बेचेने जाता हूँ| बहुत छोटी सी उम्र में उसे ग्राहकों से बात करने का हुनर आ गया| वो रोजाना 200 रूपए के आसपास कमा लेता है जिसमे ज्यादा शारीरिक श्रम नहीं होता| यह पैसे उसके परिवार के लिए खाने और अन्य ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करते है|बस्ती के यूथ समूह लेके युवकों ने उसे समझाया कि वो यह काम न करे किन्तु जब उसने कहा कि मेरे घर में खाना कैसे बनेगा तो इसका जवाब किसी के पास नहीं था|

इस लॉक डाउन ने अर्जुन जैसे बहुत से बच्चों को काम की तरफ धकेल दिया है, जिसमे कुछशराब बेचने जैसे खतरनाक तो कुछ साधारण काम भी शामिल हैं| इस लॉक डाउन के बाद उसे फिर से पढ़ाई से जोड़ पाना हम सभी के लिए एक बड़ी चुनौती होगी| यह समय और काम आगे उसके जीवन को किस दिशा में लेकर जाएगा और इसका उसके जीवन पर कितना गहरा असर पड़ेगा यह भविष्य ही बताएगा किन्तु फिलहाल हम अर्जुन के प्रश्नों का जवाब दे पाने में खुद को असमर्थ पाते हैं| उम्मीद है और हमारा प्रयास होगा कि लॉक डाउन हटने के बाद अर्जुन को काम न करना पड़े और वह अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाये|

 * नाम बदला हुआ है

लेखक: ब्रजेश वर्मा 

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