माता मंदिर,भोपाल में मल्टी बना रहे मजदूरों की स्थिति

अब शहर को आपकी ज़रुरत भी नहीं, और परवाह भी नहीं|

‘नींद से बड़ी भूख है’

पिछले डेढ़ वर्ष से माता मंदिर, भोपाल पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मल्टी बनने का काम जारी था| लॉकडाउन में सभी निर्माण कार्य के रोक में यहाँ की गाड़ी भी मार्च 22 को रुक गयी| लेकिन यहाँ पर ठेके पर काम कर रहे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मज़दूरों की मुश्किलें शुरू हुईं|

मध्यप्रदेश के छिन्दवाड़ा, डिंडौरी, सिवनी, झांसी और होशंगाबाद ज़िले से आये प्रवासी मज़दूर एवं छत्तीसगढ़ से (मुंगेली) के रहने वाले मुख्यतः गौंड आदिवासी लोगों में कुल 300 की संख्या हैं| इसमें 60 के करीब छोटे बच्चे हैं, सबसे कम उम्र की 4 दिन की एक बच्ची और सबसे बड़े में 5 वर्ष का एक लड़का है| बाकि बच्चों को मज़दूर अपने गाँव में ही उनके परिवारजनों के सुपुत्र यहाँ काम करने आये हुए हैं| कुछ मज़दूर ‘सुप्रीम कंपनी’ द्वारा काम पर लगाये गए हैं, बाकि अधिकतर लोग सीधे ठेकेदारों द्वारा लाए गए हैं|

लॉक डाउन शुरू होने के बाद से कम्पनी द्वारा लाए गये मजदूरों को तो शुरू में हर हफ्ते 500 रुपये दिए गए (जो एडवांस के तौर पर हैं|) लेकिन ठेकेदारों के साथ आए लोगों को सिर्फ एक बार 5 किलो आटा, 1 किलो चावल, आधा किलो दाल, आधा लीटर तेल और कुछ मिर्च-नमक दिया गया था| परेशान होकर लोग यह सोचने पर मजबूर हो रहे हैं कि कैसे अब चल कर गाँव जाएँ|

शहदवती बाई का कहना है, “हम जगह जगह लोगों को अपने नाम की लिस्ट पहुंचा रहें हैं लेकिन हमें कहीं से खाने पीने की मदद नहीं मिल रही है| हम कुछ लोग इकट्ठे होकर लिस्ट लेके थाने भी गये थे, हमें वहाँ से भगा दिया गया| सरकार से तो हमें एक मुठ्ठी अनाज की मदद भी नहीं मिली है, न हमारी हालत देखने यहाँ कोई आता है|”

सुनीता मडावी जी ने बताया, महिला को 220 रुपये और भय्यन (पुरुषों) को 250 रुपये मेह्नताना मिलता रहा है 

 

 

 

 

 

 

मोहन कर्रे बता रहे कि पिछले 2 दिनों से शाम के समय कोई समाज सेवी संस्था पका हुआ भोजन देकर जा रही है| एक पूरे परिवार को चार रोटी से नहीं हो पुराता है| यहाँ रह रहे मज़दूर इस समय भूख प्यास की जिस मुश्किल से गुज़र रहे हैं, वे इतना ही चाहते हैं कि सरकार के कोई लोग आकर उनसे उनकी मुश्किलों को सुनें और उन्हें सहायता पहुंचाएं|

“मेरे परिवार में 3 लोग हैं सुबह जितना आटा था, उससे 5 रोटी बनी बच्चे को पेट भर खिला दिए बाकि हम दोनों खाए| अब शाम के लिए आज आटा नहीं है,” श्याम बाई ने अपनी बात जोड़ते हुए बताया, “तेल सब्जी तो हम मांग नहीं रहे, आटा चावल मिल जाए| रोज़ ही प्याज़ नमक से रोटी खा रहे| सूखी भी खा रहे बहुत परिवार यहाँ|”

बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति बहुत मजबूरी में चली गयी है| सिवनी के रहनेवाले एक मज़दूर परिवार ने बताया कि “बच्चों को एक टाइम, चावल खिलाकर पानी पिला देते हैं| कई बार बच्चे दुकान की चीज़ और दूध के लिए रोते हैं| कहाँ से लाकर दें? पैसे नहीं हैं पास में|” सविता कुर्रे का कहना था, “बाहिनी, नींद से बड़ी भूख है| रात को बच्चे रोते हैं तो चुप करवाकर लाँघन (भूखे) ही सुला देते हैं|” एक महीने से बच्चों को टीकाकरण और साथ ही जो पोषण आहार मिलता था, वह भी सब बंद है|

सागर की रहवासी सविता डेढ़ वर्ष पहले यहाँ मजदूरी के लिए अपने पति और मां के साथ आई थी| 4 दिन पहले सविता ने बच्ची को जन्म दिया| उनकी मां ने बताया, सविता दर्द से तड़प रही थी उसको कहाँ किस अस्पताल ले जाएं| इस दौड़ भाग में, खड़े से सविता का बच्चा जन्म लेते समय दूर जा फिका| आज 4 दिन हो गये सविता ने सूखी रोटी खा कर, चावल खा कर ही वह पानी पी लेती है| उनकी माँ ने चिंता से बताया कि “इतनी लकड़ी नहीं होती है कि चूल्हा जलाकर हम उसको गरम पानी कर कर पिला पाएं| सूखी रोटी ठन्डे पानी से निगलकर ही बच्चे को दूध पिला रही है|”

 

    लेखा – सबा खान

    सबा विभिन्न समूहों और व्यक्तिगत हैसियत में  कोविड के राहत कार्य में जुटी हैं|

     sabakhansaba786@gmail.com

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